चंद्रयान-3: रहस्यों का खुलासा!

 

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चंद्रयान-3 का मिशन था एक टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन—यह दिखाना कि भारत चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कर सकता है। लेकिन इसरो ने इसे सिर्फ तकनीकी उपलब्धि तक सीमित नहीं रखा। विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर को ढेर सारे वैज्ञानिक उपकरणों से लैस किया गया, जो चांद के साउथ पोलर रीजन की गहराइयों में छिपे रहस्यों को उजागर करने के लिए तैयार थे। लैंडिंग के बाद, ये इंस्ट्रूमेंट्स एक-एक करके एक्टिव हुए और चांद की सतह पर वैज्ञानिक खोजबीन शुरू कर दी। दो इंस्ट्रूमेंट्स ने तो ऐसी खोजें कीं, जिन्हें सुनकर वैज्ञानिकों की आंखें चमक उठीं। आइए, इनके बारे में डिटेल में जानते हैं।

इंस्ट्रूमेंट 1: ILSA - चांद की धड़कन सुनने वाला जासूस

ILSA क्या है?

ILSA यानी Instrument for Lunar Seismic Activity। ये एक ऐसा सुपर-सेंसिटिव डिवाइस है, जो चांद की सतह पर होने वाली हर छोटी-बड़ी हलचल (वाइब्रेशंस) को रिकॉर्ड करता है। इसे आप चांद का "सीस्मोग्राफ" कह सकते हैं। नासा के अपोलो मिशन्स के बाद, ये पहला मौका था जब चांद पर कोई सीस्मिक इंस्ट्रूमेंट काम कर रहा था, वो भी साउथ पोल जैसे अनदेखे इलाके में।

ILSA में छह एक्सीलरोमीटर्स लगे हैं, जो MEMS (Micro-Electro-Mechanical Systems) टेक्नोलॉजी पर काम करते हैं। इन सेंसर्स का काम है किसी भी तरह की हलचल को इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स में बदलना। इसके लिए इसमें स्प्रिंग-मास सिस्टम का इस्तेमाल होता है, जो इतना सटीक है कि मिट्टी के एक कण के गिरने जैसी बारीक हलचल को भी पकड़ सकता है। ये सेंसर्स 3D में वाइब्रेशंस को कैप्चर करते हैं—चाहे वो सतह के नीचे से आएं या आसपास की सतह से।

ILSA की चौंकाने वाली खोज !

24 अगस्त 2023 को ILSA एक्टिव हुआ और इसने 250 सीस्मिक सिग्नल्स रिकॉर्ड किए। इनमें से 200 सिग्नल्स तो समझ में आए—ये चंद्रयान-3 के ही इंस्ट्रूमेंट्स (जैसे थर्मल प्रोब या प्रज्ञान रोवर की मूवमेंट) से पैदा हुए थे। लेकिन 50 सिग्नल्स ऐसे थे, जिन्हें समझना वैज्ञानिकों के लिए पहेली बन गया। इन्हें Uncorrelated Events कहा गया।

क्या थे ये रहस्यमयी सिग्नल्स?

कुछ सिग्नल्स शॉर्ट इंपल्सिव बर्स्ट्स थे, यानी अचानक होने वाली तेज हलचल। कुछ लंबे और धीमे वाइब्रेशंस थे। इनकी फ्रीक्वेंसी 1 से 50 हर्ट्ज थी, और कुछ तो 94 हर्ट्ज तक पहुंच गए—जो चांद के लिए असामान्य है। इनका कारण क्या हो सकता है?

> वैज्ञानिकों ने कुछ थ्योरीज दीं:

(1) माइक्रो-मीटियोराइट्स: छोटे-छोटे अंतरिक्षीय पत्थर (माइक्रो-मीटियोराइट्स) चांद की सतह से टकराए, जिससे तेज और हाई-फ्रीक्वेंसी सिग्नल्स पैदा हुए।

(2) थर्मल एक्सपेंशन: चांद पर दिन-रात के दौरान तापमान में भारी उतार-चढ़ाव (-20°C से +60°C) होता है। इससे चांद की सतह सिकुड़ती और फैलती है, जिससे सीस्मिक हलचल पैदा हो सकती है।

इन रहस्यमयी सिग्नल्स की तुलना नासा के अपोलो मिशन्स और मंगल पर इनसाइट मिशन से मिले डेटा से की गई। ये सिग्नल्स बताते हैं कि चांद जैसे रॉकी बॉडीज में ऐसी हलचलें आम हो सकती हैं। भविष्य में, जब चांद पर ह्यूमन कॉलोनी बनाने की बात आएगी, ILSA का ये डेटा स्ट्रक्चर्स डिजाइन करने में गेम-चेंजर साबित होगा।

इंस्ट्रूमेंट 2: APXS - चांद की मिट्टी का केमिकल खजाना

APXS क्या है?

APXS यानी Alpha Particle X-ray Spectrometer। ये प्रज्ञान रोवर का एक खास उपकरण है, जो चांद की मिट्टी (लूनर सॉइल) का केमिकल एनालिसिस करता है। ये एक स्पेक्ट्रोमीटर है, जो चांद की सतह पर अल्फा पार्टिकल्स और एक्स-रे भेजता है। जब ये किरणें सतह से टकराकर लौटती हैं, तो उनके स्पेक्ट्रम से मिट्टी में मौजूद तत्वों और मिनरल्स का पता चलता है।

APXS ने साउथ पोल रीजन से 23 सैंपल्स कलेक्ट किए और उनके डेटा को पृथ्वी पर भेजा। जब वैज्ञानिकों ने इस डेटा को खंगाला, तो दो बड़ी खोजें सामने आईं।

APXS की गेम-चेंजिंग खोजें,

(1) फेरोन एनोर्थोसाइट: मैग्मा ओशन का सबूत

APXS ने चांद की मिट्टी में फेरोन एनोर्थोसाइट नामक मिनरल की मौजूदगी पकड़ी। ये एक हल्का, हल्के रंग का मिनरल है, जो तब बनता है जब गर्म, पिघला हुआ मैग्मा ठंडा होकर सॉलिडिफाई होता है। ये मिनरल चांद के साउथ पोल पर पहली बार पाया गया, और ये खोज इसलिए खास है क्योंकि ये मैग्मा ओशन थ्योरी को मजबूत करती है।

(2) मैग्मा ओशन थ्योरी क्या है?

वैज्ञानिक मानते हैं कि करीब 4.5 अरब साल पहले, पृथ्वी से मार्स के आकार के एक ऑब्जेक्ट की टक्कर से चांद बना। इस टक्कर की गर्मी से चांद की सतह पूरी तरह पिघली हुई चट्टानों का समंदर (मैग्मा ओशन) बन गई थी। जैसे-जैसे ये मैग्मा ठंडा हुआ, भारी मिनरल्स चांद की कोर में दब गए, और हल्के मिनरल्स (जैसे फेरोन एनोर्थोसाइट) सतह पर क्रस्ट बनाकर जमा हो गए। APXS की खोज इस थ्योरी का डायरेक्ट सबूत है।

(3) मैग्नीशियम की मिक्सिंग: साउथ पोल-एटकिन बेसिन का कमाल

APXS ने चांद की बाहरी सतह में मैग्नीशियम-रिच मिनरल्स की असामान्य मात्रा पाई। आमतौर पर मैग्नीशियम चांद की गहराई में पाया जाता है, लेकिन ये सतह पर कैसे पहुंचा? वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका जवाब है साउथ पोल-एटकिन बेसिन (SPA बेसिन)।

(4) SPA बेसिन क्या है?

ये चांद पर सबसे बड़ा और सोलर सिस्टम के सबसे विशाल क्रेटर्स में से एक है, जो अरबों साल पहले एक विशाल एस्टेरॉइड की टक्कर से बना। ये 2500 किमी चौड़ा और 6-8 किमी गहरा है। चंद्रयान-3 की लैंडिंग साइट इस बेसिन के किनारे से 350 किमी दूर थी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस टक्कर ने चांद की गहराई के मिनरल्स को सतह पर बिखेर दिया, जिससे मैग्नीशियम जैसे तत्व ऊपरी सतह तक पहुंच गए।ये खोज बताती है कि चांद की सतह और उसकी गहराई की लेयर्स में मिक्सिंग हुई है। ये भविष्य के मिशन्स के लिए नए सवाल खड़े करती है—क्या और भी गहरे मिनरल्स सतह पर मौजूद हैं? अगर हां, तो क्या हम उन्हें संसाधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं?

चांद का अतीत, भविष्य की राह,

चंद्रयान-3 की ये खोजें ना सिर्फ चांद के अतीत की कहानी बयां करती हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी रास्ता दिखाती हैं। ILSA के सीस्मिक डेटा से हमें चांद की सतह की स्थिरता समझ आएगी, जो वहां कॉलोनी बनाने के लिए जरूरी है। APXS की खोजें चांद के जन्म और उसके इवॉल्यूशन की कहानी को और पुख्ता करती हैं।नेचर जर्नल में पब्लिश ये फाइंडिंग्स चंद्रयान-3 की पहली एनिवर्सरी से ठीक दो दिन पहले सामने आईं। ये बताती हैं कि चंद्रयान-3 सिर्फ एक मिशन नहीं, बल्कि चांद की पहेलियों को सुलझाने की एक नई शुरुआत है।

चांद की कहानी अभी बाकी है!

चंद्रयान-3 ने चांद के साउथ पोल को वैज्ञानिकों के लिए एक खुली किताब बना दिया है। लेकिन ये किताब अभी पूरी नहीं पढ़ी गई। इसरो के अगले मिशन्स और ग्लोबल स्पेस कम्युनिटी के साथ मिलकर हम चांद के और रहस्य खोलेंगे। तब तक, चांद की इस रोमांचक यात्रा का हिस्सा बनें .

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