समुद्र की गहराइयों में डार्क ऑक्सीजन

 समुद्र की अंधेरी गहराइयों में, जहाँ सूरज की किरणें नहीं पहुँचतीं, वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है जिसने हमारी समझ को चुनौती दी है। डार्क ऑक्सीजन की यह खोज, जो पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स से उत्पन्न हो रही है, न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समुद्र की जैव-विविधता और डीप-सी माइनिंग के खतरों पर भी सवाल उठाती है। इस ब्लॉग में, हम इस खोज के हर पहलू को विस्तार से समझेंगे, नवीनतम जानकारी और वैज्ञानिक विवादों को शामिल करते हुए।

Dark Oxygen, Polymetallic Nodules, Deep-Sea Mining, Clariion-Clipperton Zone (CCZ), Oxygen Production, Electrolysis, Marine Biodiversity, Environmental Impact, Scientific Discovery, Andrew Sweetman, Nature Geoscience, Pacific Ocean, Ecosystem Destruction, Economic Value, Life Evolution, Deep Ocean Mission, Plastic Pollution, Scientific Controversy, Alien Life, Conservation Efforts


1. परिचय: समुद्र की गहराइयों में एक रहस्यमयी खोज

2013 में, स्कॉटिश एसोसिएशन फॉर मरीन साइंस (SAMS) के वैज्ञानिक एंड्र्यू स्वीटमैन और उनकी टीम ने प्रशांत महासागर के क्लेरियन-क्लिपरटन जोन (CCZ) में एक अनोखा प्रयोग शुरू किया। यह क्षेत्र, जो हवाई और मैक्सिको के बीच 45 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है, पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स की उच्च सांद्रता के लिए प्रसिद्ध है।

लेकिन उनकी खोज ने एक अनपेक्षित रहस्य उजागर किया: समुद्र की गहराई में ऑक्सीजन का स्तर कम होने के बजाय बढ़ रहा था। इस ऑक्सीजन को डार्क ऑक्सीजन नाम दिया गया, क्योंकि यह बिना फोटोसिंथेसिस के उत्पन्न हो रहा था। यह खोज नेचर जियोसाइंस जर्नल में 2024 में प्रकाशित हुई और वैज्ञानिक समुदाय में हलचल मचा दी। आइए, इस खोज के विभिन्न पहलुओं को आसानी से समझते हैं।

2. डार्क ऑक्सीजन: परिभाषा और महत्व

डार्क ऑक्सीजन वह ऑक्सीजन है जो समुद्र की गहराइयों में, जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता, उत्पन्न हो रही है। परंपरागत रूप से, ऑक्सीजन का उत्पादन फाइटोप्लांकटन, एल्गी, और सियानोबैक्टीरिया द्वारा फोटोसिंथेसिस के माध्यम से होता है, जो समुद्र की सतह पर होता है। यह ऑक्सीजन धीरे-धीरे गहरे समुद्र में घुलता है, लेकिन वहाँ इसकी मात्रा कम हो जाती है।

हालांकि, स्वीटमैन की टीम ने पाया कि क्लेरियन-क्लिपरटन जोन में 4,000-5,000 मीटर की गहराई पर ऑक्सीजन की मात्रा न केवल बनी रहती है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में सतह के पानी से भी अधिक है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समुद्री जीवन के लिए नए पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystems) की संभावना को दर्शाती है, जो पहले अज्ञात थे।

3. पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स: समुद्र का खनिज खजाना

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स छोटे, आलू के आकार के खनिज पत्थर हैं, जो समुद्र तल पर लाखों वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। ये नोड्यूल्स मैंगनीज, निकेल, कोबाल्ट, तांबा, और लोहे के हाइड्रॉक्साइड जैसे मूल्यवान धातुओं से बने होते हैं।

गठन: ये नोड्यूल्स प्रकृति द्वारा लाखों-करोड़ों सालों में बनाए जाते हैं, जिसमें खनिजों की परतें धीरे-धीरे जमा होती हैं। 

आर्थिक महत्व: क्लेरियन-क्लिपरटन जोन में इन नोड्यूल्स का अनुमानित मूल्य 16-17 ट्रिलियन डॉलर है, जो इन्हें डीप-सी माइनिंग के लिए आकर्षक बनाता है। 

वितरण: ये 90 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं, जिनकी कुल मात्रा 2100 करोड़ टन है।

ये नोड्यूल्स न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि डार्क ऑक्सीजन के उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

4. डार्क ऑक्सीजन का स्रोत: वैज्ञानिक प्रयोग

स्वीटमैन और उनके सहयोगी डॉ. फ्रांस गीगर ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए कई प्रयोग किए। उनके ऑटोमेटेड सी फ्लोर लैंडर ने समुद्र तल पर ऑक्सीजन के स्तर को मापा, और परिणाम चौंकाने वाले थे।

प्रयोग की प्रक्रिया: लैंडर ने बेंटिक चेंबर के माध्यम से गहरे पानी को एकत्र किया और सेंसरों द्वारा ऑक्सीजन की मात्रा को मापा। परिणामों ने दिखाया कि ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ रही थी, जो सामान्य समझ के विपरीत था।

लैब टेस्ट: नोड्यूल्स को मरक्यूरी क्लोराइड से कीटाणुरहित किया गया ताकि यह सुनिश्चित हो कि ऑक्सीजन का स्रोत कोई माइक्रोबियल एक्टिविटी नहीं है। फिर इन्हें एक एयरटाइट जार में ठंडे, नमकीन पानी के वातावरण में रखा गया। ऑक्सीजन का स्तर सामान्य से तीन गुना तक बढ़ गया।

यह साबित करता है कि डार्क ऑक्सीजन का स्रोत एबायोटिक (जीव-स्वतंत्र) है, जो नोड्यूल्स से उत्पन्न हो रहा है।

5. इलेक्ट्रोलाइसिस: समुद्र की प्राकृतिक बैटरी

डॉ. गीगर ने एक पुराने प्रयोग को आधार बनाया, जिसमें दिखाया गया था कि नमकीन पानी और धातुएँ इलेक्ट्रिसिटी उत्पन्न कर सकती हैं। इस सिद्धांत को लागू करते हुए, उन्होंने नोड्यूल्स पर प्रयोग किए:

वोल्टेज मापन: नोड्यूल्स की सतह पर दो इलेक्ट्रोड्स लगाकर वोल्टमीटर से मापा गया। परिणामस्वरूप, 0.95 वोल्ट्स की बिजली उत्पन्न हुई।

इलेक्ट्रोलाइसिस का सिद्धांत: नमकीन पानी में मौजूद आयन्स (Na+, Cl-, H2+, OH-) और नोड्यूल्स में मौजूद धातु (मैंगनीज, आयरन ऑक्साइड) एक प्राकृतिक बैटरी की तरह काम करते हैं। यह बिजली पानी (H2O) को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करती है।

चुनौती: इलेक्ट्रोलाइसिस के लिए 1.23 वोल्ट्स की जरूरत होती है, लेकिन एक नोड्यूल से केवल 0.95 वोल्ट्स मिले। वैज्ञानिकों का मानना है कि कई नोड्यूल्स एक साथ मिलकर अधिक वोल्टेज उत्पन्न कर सकते हैं, जो क्लेरियन-क्लिपरटन जोन जैसे क्षेत्रों में आम है।

2024 में नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित इस अध्ययन ने इस खोज को वैज्ञानिक मान्यता दी।

6. डीप-सी माइनिंग: आर्थिक लाभ बनाम पर्यावरणीय खतरा

क्लेरियन-क्लिपरटन जोन डीप-सी माइनिंग के लिए एक प्रमुख केंद्र है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर हैं:

इकोसिस्टम का विनाश: 1980 में इस क्षेत्र में हुई टेस्ट माइनिंग ने 70-80% समुद्री जीवों को नष्ट कर दिया, जो 45 साल बाद भी ठीक नहीं हुए।

जैव-विविधता: इस क्षेत्र में 5000-6000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 88-92% केवल यहीं पाई जाती हैं। ये प्रजातियाँ डार्क ऑक्सीजन पर निर्भर हैं।

माइनिंग का प्रभाव: नोड्यूल्स को हटाने से समुद्र तल का इकोसिस्टम नष्ट हो सकता है, जिससे ऑक्सीजन उत्पादन और जैव-विविधता प्रभावित होगी।

द मेटल्स कंपनी (TMC) जैसी कंपनियाँ माइनिंग के लिए भारी निवेश कर रही हैं, लेकिन उनकी लॉबिंग और वैज्ञानिक खोजों को दबाने की कोशिशें विवादास्पद हैं। TMC ने इस खोज को "flawed" और "misleading" बताया, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय ने इसे गंभीरता से लिया है।

7. डार्क ऑक्सीजन और जीवन का विकास

डार्क ऑक्सीजन की खोज ने ऑक्सीजन और जीवन के विकास के बीच संबंधों को फिर से परिभाषित किया है:

पृथ्वी का इतिहास: 4.5 अरब साल पहले पृथ्वी का जन्म हुआ, और 3.8-4.1 अरब साल पहले जीवन की शुरुआत हुई। लेकिन 2.4 अरब साल पहले तक ऑक्सीजन की मात्रा केवल 0.01% थी। ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट ने ऑक्सीजन को 21% तक बढ़ाया, जिसने जीवन को तेजी से विकसित होने में मदद की।

सियानोबैक्टीरिया: इन जीवों ने फोटोसिंथेसिस के जरिए ऑक्सीजन छोड़ा, जिसने पृथ्वी को रहने योग्य बनाया।

डार्क ऑक्सीजन का रोल: यह सुझाव देता है कि ऑक्सीजन का उत्पादन फोटोसिंथेसिस के बिना भी संभव है, जिससे समुद्र की गहराइयों में जीवन की उत्पत्ति और विकास पर नए सवाल उठते हैं।

यह खोज यह भी संकेत देती है कि डीप-सी इकोसिस्टम्स में जीवन डार्क ऑक्सीजन पर निर्भर हो सकता है, जो पहले की तुलना में अधिक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र की ओर इशारा करता है।

8. भारत का डीप ओशन मिशन: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य

भारत भी डीप ओशन मिशन (DOM) के तहत समुद्र की गहराइयों का अन्वेषण कर रहा है। यह मिशन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) द्वारा संचालित है और ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है।

समुद्रयान मिशन: 2026 तक, भारत मत्स्य 6000 नामक मानवयुक्त पनडुब्बी को 6,000 मीटर की गहराई तक भेजेगा।

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स: मध्य हिंद महासागर में 6,000 मीटर की गहराई पर नोड्यूल्स के खनन के लिए वराह नामक एकीकृत खनन प्रणाली विकसित की जा रही है।

उद्देश्य: गहरे समुद्र में खनिजों की खोज, जैव-विविधता का संरक्षण, और महासागरीय थर्मल ऊर्जा रूपांतरण (OTEC) जैसी तकनीकों का विकास।

हालांकि, भारत का यह मिशन भी पर्यावरणीय चिंताओं से मुक्त नहीं है। डीप-सी माइनिंग के प्रभावों को समझना और संरक्षण सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।

9. पर्यावरणीय संकट: माइनिंग और प्लास्टिक प्रदूषण

डीप-सी माइनिंग के साथ-साथ समुद्र में बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण भी एक बड़ा खतरा है:

ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच: यह कचरे का ढेर दो पाकिस्तान जितना बड़ा है, जिसमें 5.25 ट्रिलियन प्लास्टिक टुकड़े हैं। हर साल 1 मिलियन समुद्री पक्षी और 1 लाख समुद्री स्तनधारी इसकी वजह से मरते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक्स: ये सूक्ष्म कण मछलियों, पक्षियों, और मानव शरीर में पहुंच रहे हैं। एक औसत इंसान हर साल 78,000 से 2,11,000 माइक्रोप्लास्टिक्स खा रहा है। मस्तिष्क में 6-7 ग्राम प्लास्टिक पाया गया है, जो एक क्रेडिट कार्ड के वजन के बराबर है।

स्वास्थ्य प्रभाव: माइक्रोप्लास्टिक्स नवजात शिशुओं के प्लेसेंटा में भी पाए गए हैं, जो उनके विकास को प्रभावित कर सकते हैं।

ये समस्याएँ समुद्र के नाजुक इकोसिस्टम्स को खतरे में डाल रही हैं।

10. वैज्ञानिक विवाद और आलोचनाएँ

डार्क ऑक्सीजन की खोज ने वैज्ञानिक समुदाय में बहस छेड़ दी है:

आलोचनाएँ: द मेटल्स कंपनी (TMC) ने इस खोज को "flawed" बताया और नेचर जियोसाइंस जर्नल पर सवाल उठाए।

वैज्ञानिक आपत्तियाँ: आरहोस यूनिवर्सिटी के बोर्कर जॉर्गनसन जैसे शोधकर्ताओं ने मेथोडोलॉजिकल कमियों की ओर इशारा किया, जैसे: (a) डीप-सी के 400 गुना अधिक दबाव को लैब में दोहराया नहीं गया। (ɓ)0.95 से 1.23 वोल्ट्स की प्रक्रिया का मैकेनिज्म स्पष्ट नहीं है। (c)हाइड्रोजन गैस के स्तर को सटीक रूप से मापा नहीं गया।

समर्थन: अधिकांश समुद्री वैज्ञानिक इस खोज का समर्थन करते हैं। निपॉन फाउंडेशन ने 2025-2028 के लिए 2 मिलियन पाउंड्स का ग्रांट दिया है ताकि इसे और गहराई से समझा जा सके।

साइंस में ऐसी बहसें सामान्य हैं, जो सटीकता और सत्य की खोज को तेज करती हैं।

11. भविष्य की राह: रिसर्च और संरक्षण

स्वीटमैन और उनकी टीम 2025 से 2028 तक निपॉन फाउंडेशन के समर्थन से गहन शोध करेंगे। उनके प्रमुख लक्ष्य हैं:

खोज की पुनरावृत्ति : डार्क ऑक्सीजन की खोज को दोहराना।

हाइड्रोजन मापन: इलेक्ट्रोलाइसिस में उत्पन्न होने वाली हाइड्रोजन गैस को मापना।

इकोसिस्टम पर प्रभाव: डीप-सी जीवों पर डार्क ऑक्सीजन की निर्भरता को समझना।

माइक्रोब्स की भूमिका: यह जांचना कि क्या माइक्रोब्स इस प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने डीप-सी माइनिंग पर अस्थायी रोक लगाई है, जिसे 33 देश समर्थन दे रहे हैं। यह रोक तब तक रहेगी, जब तक माइनिंग के जोखिमों को पूरी तरह समझ नहीं लिया जाता।

12. डार्क ऑक्सीजन और एलियन जीवन की खोज

डार्क ऑक्सीजन की खोज का प्रभाव केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं है। यह एलियन जीवन की खोज को भी प्रभावित कर सकता है:

परंपरागत दृष्टिकोण: हम गोल्डीलॉक्स जोन में ग्रहों की खोज करते हैं, जहाँ सूर्य और तरल पानी मौजूद हो।

नया दृष्टिकोण: डार्क ऑक्सीजन यह सुझाव देता है कि फोटोसिंथेसिस के बिना भी ऑक्सीजन उत्पादन संभव है। इससे हाइड्रोथर्मल वेंट्स और गहरे समुद्रों वाले ग्रहों पर जीवन की संभावना बढ़ती है।

यह खोज हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या जीवन के लिए सूर्य और तरल महासागर जरूरी हैं, या गहरे समुद्रों में केमिस्ट्री और ऊर्जा ही पर्याप्त हैं।

13. निष्कर्ष: प्रकृति की रक्षा हमारी जिम्मेदारी

डार्क ऑक्सीजन की खोज ने समुद्र की जटिलता और नाजुकता को उजागर किया है। यह न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्रांतिकारी है, बल्कि यह हमें पर्यावरण संरक्षण की जरूरत भी सिखाती है। डीप-सी माइनिंग और प्लास्टिक प्रदूषण जैसे खतरे समुद्र के इकोसिस्टम्स को नष्ट कर सकते हैं, जो पृथ्वी के जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

हमें यह समझना होगा कि प्रकृति ने हमें जीवन दिया है, और अब हमारी बारी है कि हम इसे बचाएँ। इस ब्लॉग को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें, ताकि हम सब मिलकर इस ग्रह को बेहतर बनाने में योगदान दे सकें। जय हिंद!

संदर्भ: -: Drishti IAS, डार्क ऑक्सीजन की खोज, 2024-07-30 -: PWOnlyIAS, डीप ओशन मिशन, 2025-05-19 -: Drishti IAS, भारत का डीप ओशन मिशन, 2019-08-06 -: Drishti IAS, डीप ओशन मिशन, 2023-11-06 -: Khanglobalstudies, भारत का डीप ओशन मिशन, 2025-01-25 -: Drishti IAS, डीप ओशन मिशन, 2021-06-18 -: Aajtak.in, डार्क ऑक्सीजन, 2024-07-23

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ