पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स पर और जानकारी

 समुद्र की गहराइयों का खजाना और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स समुद्र तल पर पाए जाने वाले खनिज युक्त पत्थर हैं, जो आर्थिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हाल ही में, डार्क ऑक्सीजन की खोज ने इन नोड्यूल्स को वैश्विक चर्चा का केंद्र बना दिया है। यह ब्लॉग इन नोड्यूल्स की संरचना, महत्व, पर्यावरणीय प्रभाव, और नवीनतम शोध विस्तार से समझाएगा।

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1. पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स: परिभाषा और संरचना

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स छोटे, आलू के आकार के खनिज युक्त पत्थर हैं, जो समुद्र तल पर 4,000 से 6,000 मीटर की गहराई में पाए जाते हैं। ये नोड्यूल्स कई धातुओं और खनिजों से बने होते हैं, जिनमें शामिल हैं:

मैंगनीज (Manganese): बैटरी और स्टील उत्पादन में उपयोगी।

निकेल (Nickel): इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी में महत्वपूर्ण।

कोबाल्ट (Cobalt): रिचार्जेबल बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग।

तांबा (Copper): इलेक्ट्रिकल वायरिंग और तकनीकी उपकरणों में।

लोहे के हाइड्रॉक्साइड (Iron Hydroxides): अन्य औद्योगिक उपयोग।

इन नोड्यूल्स का गठन लाखों-करोड़ों सालों में होता है, जब समुद्री जल में मौजूद खनिज धीरे-धीरे परत-दर-परत जमा होते हैं। इनका आकार 1 से 10 सेंटीमीटर तक हो सकता है।

2. कहाँ पाए जाते हैं पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स?

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स विश्व के कई महासागरों में पाए जाते हैं, लेकिन कुछ क्षेत्र विशेष रूप से समृद्ध हैं:

क्लेरियन-क्लिपरटन जोन (CCZ): प्रशांत महासागर में हवाई और मैक्सिको के बीच 45 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र सबसे बड़ा नोड्यूल्स भंडार है। यहाँ 2100 करोड़ टन नोड्यूल्स मौजूद हैं, जिनका मूल्य 16-17 ट्रिलियन डॉलर अनुमानित है।

हिंद महासागर: मध्य हिंद महासागर में भारत के डीप ओशन मिशन के तहत नोड्यूल्स की खोज की जा रही है।

पेरू बेसिन और पेनरहिन बेसिन: ये भी नोड्यूल्स के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

ये नोड्यूल्स समुद्र तल पर 90 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं, जो इन्हें डीप-सी माइनिंग के लिए आकर्षक बनाता है।

3. डार्क ऑक्सीजन और पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स

2024 में नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित एक अध्ययन ने पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स को डार्क ऑक्सीजन के स्रोत के रूप में पहचाना। यह खोज एंड्र्यू स्वीटमैन और डॉ. फ्रांस गीगर की टीम द्वारा की गई।

खोज: क्लेरियन-क्लिपरटन जोन में 4,000-5,000 मीटर की गहराई पर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ रही थी, जो फोटोसिंथेसिस के बिना संभव नहीं थी।

प्रक्रिया: नोड्यूल्स समुद्री जल के साथ मिलकर इलेक्ट्रोलाइसिस की प्रक्रिया शुरू करते हैं। नमकीन पानी में मौजूद आयन्स (Na+, Cl-, H2+, OH-) और नोड्यूल्स में मौजूद धातुएँ (मैंगनीज, आयरन ऑक्साइड) एक प्राकृतिक बैटरी की तरह काम करते हैं, जो पानी (H2O) को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करती है।

वोल्टेज: एक नोड्यूल से 0.95 वोल्ट्स की बिजली उत्पन्न हुई, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि कई नोड्यूल्स एक साथ मिलकर 1.23 वोल्ट्स या अधिक उत्पन्न कर सकते हैं, जो इलेक्ट्रोलाइसिस के लिए आवश्यक है।

यह डार्क ऑक्सीजन समुद्री जीवन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, विशेष रूप से उन प्रजातियों के लिए जो गहरे समुद्र में रहती हैं।

4. आर्थिक महत्व: डीप-सी माइनिंग का खजाना

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स को डीप-सी माइनिंग के लिए "सोने की खान" माना जाता है:

मूल्य: क्लेरियन-क्लिपरटन जोन में मौजूद नोड्यूल्स का मूल्य 16-17 ट्रिलियन डॉलर है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

उपयोग: इन नोड्यूल्स से प्राप्त धातुएँ इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, रिन्यूएबल एनर्जी, और इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग होती हैं।

माँग: वैश्विक स्तर पर निकेल और कोबाल्ट की माँग बढ़ रही है, जिसने डीप-सी माइनिंग को और आकर्षक बना दिया है।

हालांकि, द मेटल्स कंपनी (TMC) जैसी कंपनियाँ इन नोड्यूल्स के खनन के लिए भारी निवेश कर रही हैं, जिससे पर्यावरणीय चिंताएँ बढ़ रही हैं।

5. पर्यावरणीय प्रभाव: एक नाजुक इकोसिस्टम का खतरा

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स न केवल खनिज संसाधन हैं, बल्कि गहरे समुद्र के इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं:

जैव-विविधता: क्लेरियन-क्लिपरटन जोन में 5000-6000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 88-92% केवल यहीं पाई जाती हैं। ये प्रजातियाँ डार्क ऑक्सीजन पर निर्भर हो सकती हैं।

माइनिंग का प्रभाव: 1980 में इस क्षेत्र में हुई टेस्ट माइनिंग ने 70-80% समुद्री जीवों को नष्ट कर दिया, जो 45 साल बाद भी ठीक नहीं हुए।

इकोसिस्टम का नुकसान: नोड्यूल्स को हटाने से समुद्र तल का संतुलन बिगड़ता है, जिससे सेडिमेंट प्लम्स बनते हैं जो समुद्री जीवन को दबा सकते हैं।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने डीप-सी माइनिंग पर अस्थायी रोक की सिफारिश की है, जिसे 33 देश समर्थन दे रहे हैं।

6. भारत का डीप ओशन मिशन: पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स की खोज

भारत डीप ओशन मिशन (DOM) के तहत पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स की खोज और खनन में सक्रिय है, जिसे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) संचालित करता है:

उद्देश्य: गहरे समुद्र में खनिजों की खोज, जैव-विविधता का संरक्षण, और महासागरीय थर्मल ऊर्जा रूपांतरण (OTEC) का विकास।

समुद्रयान मिशन: 2026 तक, भारत मत्स्य 6000 नामक मानवयुक्त पनडुब्बी को 6,000 मीटर की गहराई तक भेजेगा।

खनन प्रणाली: मध्य हिंद महासागर में नोड्यूल्स के खनन के लिए वराह नामक एकीकृत खनन प्रणाली विकसित की जा रही है।

क्षेत्र: भारत को इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) ने हिंद महासागर में 75,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आवंटित किया है। हालांकि, भारत को पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखते हुए सतर्क रहना होगा।

7. वैज्ञानिक विवाद: डार्क ऑक्सीजन की खोज पर सवाल 

डार्क ऑक्सीजन की खोज ने वैज्ञानिक समुदाय में बहस छेड़ दी है:

आलोचनाएँ: द मेटल्स कंपनी (TMC) ने इस खोज को "flawed" और "misleading" बताया, यह दावा करते हुए कि उनके 12 साल के शोध में ऐसे परिणाम नहीं मिले।

मेथोडोलॉजिकल कमियाँ: कुछ वैज्ञानिकों, जैसे आरहोस यूनिवर्सिटी के बोर्कर जॉर्गनसन, ने निम्नलिखित कमियों की ओर इशारा किया: (a)दबाव का अभाव: लैब में डीप-सी के 400 गुना अधिक दबाव को दोहराया नहीं गया। (b)वोल्टेज का अंतर: 0.95 से 1.23 वोल्ट्स की प्रक्रिया का मैकेनिज्म स्पष्ट नहीं है।(c)हाइड्रोजन मापन: इलेक्ट्रोलाइसिस में उत्पन्न होने वाली हाइड्रोजन गैस को सटीक रूप से नहीं मापा गया।

समर्थन: निपॉन फाउंडेशन ने 2025-2028 के लिए 2 मिलियन पाउंड्स का ग्रांट दिया है ताकि इस खोज को और गहराई से समझा जा सके।

ये विवाद साइंस की प्रगति का हिस्सा हैं, जो सत्य की खोज को और सटीक बनाते हैं।

8. भविष्य के शोध: अगले कदम

एंड्र्यू स्वीटमैन और उनकी टीम 2025-2028 तक निम्नलिखित लक्ष्यों पर काम करेंगे:

पुनरावृत्ति: डार्क ऑक्सीजन की खोज को दोहराना।

हाइड्रोजन मापन: इलेक्ट्रोलाइसिस में उत्पन्न होने वाली हाइड्रोजन गैस को मापना।

इकोसिस्टम पर प्रभाव: डीप-सी जीवों पर डार्क ऑक्सीजन की निर्भरता को समझना।

माइक्रोब्स की भूमिका: यह जांचना कि क्या माइक्रोब्स इस प्रक्रिया में योगदान करते हैं।

2026 में, शोध दल 11,000 मीटर की गहराई तक उपकरण भेजेगा ताकि और सटीक डेटा एकत्र किया जा सके।

9. पर्यावरणीय और वैश्विक प्रभाव

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स और डीप-सी माइनिंग के प्रभाव न केवल स्थानीय, बल्कि वैश्विक हैं:

प्लास्टिक प्रदूषण: ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच जैसे क्षेत्र, जो 5.25 ट्रिलियन प्लास्टिक पीसेस से भरे हैं, समुद्री जीवन को नष्ट कर रहे हैं।

माइक्रोप्लास्टिक्स: ये मछलियों, पक्षियों, और मानव शरीर में पहुंच रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।

वैश्विक नीतियाँ: इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) डीप-सी माइनिंग को नियंत्रित करती है, लेकिन पर्यावरणीय मानकों को लागू करने में चुनौतियाँ हैं।

भारत जैसे देशों को आर्थिक लाभ और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा।

10. निष्कर्ष: संतुलन की आवश्यकता

पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स समुद्र की गहराइयों में एक आर्थिक खजाना और वैज्ञानिक चमत्कार हैं। डार्क ऑक्सीजन की खोज ने इन नोड्यूल्स को न केवल खनिज संसाधन, बल्कि गहरे समुद्र के इकोसिस्टम का आधार बनाया है। हालांकि, डीप-सी माइनिंग और प्लास्टिक प्रदूषण जैसे खतरे इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर सकते हैं।

हमें आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। भारत का डीप ओशन मिशन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसे सतर्कता और जिम्मेदारी के साथ लागू करना होगा। इस ब्लॉग को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें ताकि हम सब मिलकर समुद्र की रक्षा कर सकें। जय हिंद!

संदर्भ:Drishti IAS, डार्क ऑक्सीजन की खोज, 2024-07-30, PWOnlyIAS, डीप ओशन मिशन, 2025-05-19, Drishti IAS, भारत का डीप ओशन मिशन, 2019-08-06, Aajtak.in, डार्क ऑक्सीजन, 2024-07-23

यह ब्लॉग पॉलीमेटलिक नोड्यूल्स पर नवीनतम जानकारी प्रदान करता है, जिसमें वैज्ञानिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय पहलू शामिल हैं।

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